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ईद पर बोली, कबाब (मांस) उड़ाओ, दिवाली पर बोली "ग्रीन दिवाली मनाओ", इतना दोगलापन कहाँ सीखते हैं ?



हमारा बस इतना सा ही सवाल है की भारत के वामपंथी इतना दोगलापन आखिर सीखते कहाँ से है 
कोई स्पेशल कोर्स करते है क्या 
या कोख से ही ऐसे निकलते है, ये गहरे शोध का विषय तो है 

क्यूंकि बेशर्म से बेशर्म इंसान भी इतने दोगलेपन के बाद खुद पर शर्मा जाये, पर वामपंथियों का तो कहना ही क्या, आपको 1 ही इंसान के 2 ट्वीट दिखाते है 



सितम्बर 2017 में सागरिका घोसे इस्लामिक त्यौहार बकरीद पर लोगों को बधाइयाँ देती है 
और कहती है, ईद को अच्छे से मनाओ, कबाब यानि मांस उड़ाओ 

बकरीद के दिन जानवरों को काटा जाता है, और उनका मांस भी खाया जाता है, मैडम बता रही है की जानवर काटो और कबाबा बनाकर खाओ, अच्छे से त्यौहार मनाओ 

वहीँ अक्टूबर 2017 में मैडम कहती है की, मैं तो ग्रीन दिवाली मना रही हूँ 
ग्रीन दिवाली का मतलब, पटाखा मत फोड़ो, प्रदुषण मत फैलाओ, शोर मत मचाओ इत्यादि 

खून जरूर बहाओ, जानवर काट कर खाओ, पर पटाखा मत फोड़ो 
बस कोई हमे इतना समझा दे की इतना दोगलापन आखिर आता कहा से है ?